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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 94

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 94 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 94

संस्कृत श्लोक

पीत्वामृतोपमं शीतं प्राणः सोममुखागमे । अभ्रागमात्पूरयति शरीरं पीनतां गतः ॥ ९४ ॥

हिन्दी अर्थ

मुख के सदृश सुशोभित हो रहे चन्द्रमा से युक्त वसन्त ओर ग्रीष्म ऋतु के आनेपर गरमी से युक्त वायु पृथिवी का अमृत के तुल्य शीतल जल पीकर वर्षाऋतु में मेघ के आगमन से (उसका वेश धारण करने से) स्थूल होकर वृष्टि से जगत्‌ के शरीर को परिपूर्ण कर देता है । अथवा-आध्यात्मिक प्राण ही (5) सोम-सुख से अन्नपानादि का उदर में आगमन होने पर अमृत के तुल्य उनका रस पीकर परिपुष्ट होकर अभ्र के समान व्याप्त सम्पूर्ण नाडियो में आगमन करके शरीर को भर देता है । यही इसका पुनः सोम परिणाम है - यह अर्थ हे