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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 69

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 69

संस्कृत श्लोक

वातैराहन्यमानं तत्पद्मादि तरलायते । हृद्यन्यान्यैति कार्येण पल्लवादि यथा तरोः ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

जीर्ण बनाने की विधि बतलाते हैं। पूर्वोक्त हृदयपद्म तथा नाडीरूपी भाथी प्राणवायु से आहत होकर लोहार की भाथी की नाई कम्पित होती है, कोप रही उस भाथी के भीतर प्रविष्ट अन्न का पहले रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से त्वचा, त्वचा से मेदा, मेदा से मज्जा, मज्जा से हड्डियाँ और हड्डियों से शुक्र तैयार होता है यों विचित्र ढंग से अन्य पदार्थ की अन्य परिणति ऐसे होती है जैसे वसन्त ऋतु में वृक्ष के भीतर प्रविष्ट पृथिवी के रस की पल्लव, मंजरी, पुष्प ओर फल आदि