Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 115–116
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 115–116 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 115,116
संस्कृत श्लोक
यत्र सोमकला ग्रस्ता क्षणं सूर्येण षोडशी ।
मुखाद्वितस्तिमात्रं स्यात्तत्र बद्धपदो भव ॥ ११५ ॥
नूनं सूर्यपदं प्राप्तो यत्र सोमो हृदम्बरे ।
नूनं केवलया स्थित्या तत्र बद्धपदो भव ।। ११६
हिन्दी अर्थ
हृदयाकाश में कलाग्रास द्वारा क्रमशः ग्रसित हो रहा चन्द्रमा सूर्य के स्थान में पहुँचकर, जैसे कि अमावास्या
आने पर, केवल यानी शुद्धचिद्रूप धुवा नाम की कलात्मक स्थिति से स्थित रहता है वहाँ पर अन्तःकुम्भक
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