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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 104–105

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 104–105 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 104,105

संस्कृत श्लोक

चित्सूर्ये निर्मले दृष्टे नाम नश्येद्भवोदयम् । व्योमसूर्ये बहिर्दृष्टे यथा कृष्णनिशातमः ॥ १०४ ॥ सोमदेहे जडे दृष्टे चिन्निजे सत्यवद्भवेत् । निशीथे विलसत्यब्जे यथा सौरप्रभाभरः ॥ १०५ ॥

हिन्दी अर्थ

बाहर सूर्य के उदय से जैसे तम की निवृत्ति होती है वैसे ही अन्दर चरमवृत्ति से चिदादित्य के उदय से जगत्‌ क बीजभूत अज्ञानरूप तम की निवृत्ति होती है, यह कहते है। जिस तरह बाहर आकाश में सूर्य के दिखाई पड़ने पर काली रात का अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी तरह निर्मल चित्सूर्य के अन्दर दिखाई पड़ने पर जगत्‌ के मूल कारण अज्ञान का नाश हो जाता हे । भद्र जैसे आधी रात में कमल के अन्दर चन्द्र के विलास करने पर कमल के अन्दर प्रवेश कर स्फुरित हो रहा सूर्यप्रकाश चन्द्रधर्म चन्द्रिकात्वरूप से संपन्न होकर चन्द्रसत्ता से सत्‌ होता हुआ अपनी सत्ता से असत्‌-सा हो जाता ह वैसे ही प्रत्यगात्मा के जड़ सोमात्मक देह के अन्दर दृष्ट हो जाने पर जडदेहतादात्म्य से स्फुरित हो रही भी चिति शरीरगुणरूपता को प्राप्त होकर गुणान्तरों के सदृश शरीरगुणसत्ता से सत्‌ होती हुई भी अपनी सत्ता से असत्‌-सी हो जाती है