Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
न केचन महाबाहो भूचरेण नभस्वतः ।
अदिव्येनाश्रिता ज्ञानैर्दृश्यन्ते पुरुषेन्द्रियैः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
इन दोनों में पहले कैसे होगा 2 इस अंश का इष्टापत्ति से महाराज वसिष्ठजी परिहार करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महावाहो, यह तो आपने ठीक ही कहा है कि अज्ञान का आश्रय
करनेवाले मलिन पुरुषेन्द्रयों से या दूसरे किसी अदिव्य उपाय से इस पृथिवी पर विचरण करनेवाला
कोई भी पुरुष वायुस्वरूप आकाशगामी सिद्धं को कभी नहीं देख सकता