Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 6–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 6–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 6-8
संस्कृत श्लोक
अधस्त्वपानरूपैव मध्ये सौम्यैव सर्वदा ।
पुष्टाप्युदानरूपैव पुंसः स्वस्यैव तिष्ठति ॥ ६ ॥
सर्वयत्नमधो याति यदि यत्नान्न धार्यते ।
तत्पुमान्मृतिमायाति तया निर्गतया बलात् ॥ ७ ॥
समस्तैवोर्ध्वमायाति यदि युक्त्या न धार्यते ।
तत्पुमान्मृतिमायाति तया निर्गतया बलात् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
वृत्तिभेद का यानी भिन्न-भिन्न स्थानों में उसके रहने का प्रयोजन कहते हैं।
अधोदेश में बहने से वह अपानस्वरूप है। मध्यदेश में अपान और उदान से स्वयं खीची जा रही
भी वह सदा निश्चल ही रहती है तथा इन दोनों से अवष्टब्ध (संसक्त) रहने के कारण ही वह पुष्ट
(बलवती) होती हुई भी पुरुष के लिए उदानस्वरूपा होकर स्वस्थ ही रहती है, तात्पर्य यह कि लिंग
का बाहर उत्क्रमण नहीं कराती । उसके भिन्न-भिन्न देश में रहने का प्रयोजन केवल अपानन आदि
ही समझना चाहिए । यदि सामान्यवृत्ति उसे न पकड़ रक्खे, तो अपानवृत्ति से सब प्रयत्नपूर्वक खूब
खींची जा रही भी वह जीवसंवित् अधोमार्ग से बाहर निकल जाती है और बलपूर्वक उसके निकल
जाने से तो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। यदि युक्तिपूर्वक सामान्यवृत्ति से पकड़ न रक्खी
जाय, तो वह पूरी जीवसंवित् सर्वप्रयत्न से ऊपर चली जाती है तथा बलपूर्वक उसके निकलजाने
से तो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है