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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 70–71

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 70–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 70,71

संस्कृत श्लोक

देहेष्वाजरणं सर्वरसानां पवनोऽन्वहम् । जनयत्यग्निमन्योन्यसंघर्षाद्वनवेणुवत् ॥ ७० ॥ स्वभावशीतवातात्मा देहस्तेनौष्ण्यमेत्यथ । उदितेन स सर्वाङ्गे भुवनं भानुना यथा ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

उन सातों धातुओं के स्थान में उत्तरोत्तर परिणाम की सिद्धि के लिए परस्पर एक दूसरे के संघर्ष से जठयाग्नि की अभिव्यक्ति होती है, इस आशय से कहते हैं। देह मेँ प्राणवायु प्रतिदिन सब रसों के अन्तिम धातु शुक्र के परिणाम तक यानी जब तक शुक्र तैयार नहीं हो जाता तब तक, परस्पर संघर्षं से अग्नि उत्पन्न करनेवाले जंगली बाँस की नाई, अग्नि उत्पन्न करती हे । सारे शरीर में प्रदीप्त उस जठराग्नि से स्वभावतः शीत-वातात्मक वह शरीर ऐसे उष्णता को प्राप्त होता है जैसे सूर्य से तीनों लोक