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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 72–73

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 72–73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 72

संस्कृत श्लोक

सर्वतो विचरेदस्मिंस्तत्तेजस्तारकाकृति । हृत्पद्महेमभ्रमरो योगिनां चिन्त्यतां गतम् ॥ ७२ ॥ तत्प्रकाशमयं ज्ञानं चिन्तितं सत्प्रयच्छति । येन योजनलक्षस्थं वस्तु नित्यं हि दृश्यते ॥ ७३ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त उसी जठराग्नि की योगी लोग हृदय-कमल में तारों के आकार से उपासना करते हैं, यह कहते हैं। तारों के आकार के समान तथा हृदयपद्म में सुवर्णभ्रमर के सदुश वह तेज इस शरीर में चारों ओर विचरता है, जो योगियों की चिन्त्यदशा को प्राप्त है अर्थात्‌ जिसकी योगी लोग उपासना करते हैं