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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 95

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 95 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 95

संस्कृत श्लोक

जलमप्युदपां भोगे प्रयात्यर्कस्य रश्मिताम् । सद्रूपपरिणामेन तज्जलं वह्निकारणम् ॥ ९५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि आप यह समझते हों कि वायु पृथिवी का रस नहीं सोखता, किन्तु सूर्य की किरणें ही उसे पी जाती हैं, क्योकि रात मे भी उनकी उष्णरूप से सत्ता रहती ही है । तब तो ऐसी दशामें वे ही उदाहरण हैं, यह कहते है । सूर्य की किरणों से जलपान किया जाता है, यदि यह कल्पना की जाय, तो भी इस कल्पना में यह मानना चाहिए कि जल सूर्य की किरणता को सद्रूप परिणाम से प्राप्त करता है, इसलिए वह जलरूप चन्द्रमा अग्निका कारण हुआ