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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 110

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 110 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 110

संस्कृत श्लोक

अतिशायिनि निर्वाणे जाड्ये चैवातिशायिनि । अग्नीषोमस्य चैवाङ्ग स्थितिर्भवति केवला ॥ ११० ॥

हिन्दी अर्थ

इन दोनों की परस्पर न मिली हुई स्थिति कहाँ प्रसिद्ध है, यह कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, उपाधि की निवृत्ति से आत्यन्तिक आनन्द का आविर्भाव होने पर अग्नि की तथा आत्यन्तिक जाड्य का आविर्भाव होने पर चन्द्र की केवल (न मिली हुई) स्थिति होती हे