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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । सूक्ष्मच्छिद्रादिगत्यर्थं पूरणार्थं च खस्य वा । अणुतां स्थूलतां वापि कायोऽयं नीयते कथम् ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

अब, अणिमा और महिमा नामक सिद्धि की किस उपाय से सिद्धि होती है, यह श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । हे ब्रह्मन्‌, सूक्ष्म छिद्रों में गमन करने के लिए इस देह को अणु तथा आकाश को पूर्ण करने के लिए इस देह को स्थूल योगी लोग कैसे बना डालते हैं