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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

सान्तःकुण्डलिनीस्पन्दस्पर्शसंवित्कलामला । कलोक्ता कलनेनाशु कथिता चेतनेन चित् ॥ २ ॥ जीवनाज्जीवतां याता मननाच्च मनःस्थिता । संकल्पाच्चैव संकल्पा बोधाद्बुद्धिरिति स्मृता ॥ ३ ॥ अहंकारात्मतां याता सैषा पुर्यष्टकाभिधा । स्थिता कुण्डलिनी देहे जीवशक्तिरनुत्तमा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राणरूप से अन्दर स्फुरित हुई वह कुण्डलिनी वायुधर्म ओर स्वधर्म से स्यन्द, स्पर्श और संवित्‌- इन तीन रूपो की कल्पनास्वरूप बनकर कला, चित्‌, जीव, मन, संकल्प, बुद्धि, अहंकार, पुर्यष्टक, लिग-इत्यादि नामो को कलनादि व्यापारो की उपाधियों से प्राप्त करती है, यह कहते है । वह कुण्डलिनी प्राणरूप से अन्दर स्फुरित होकर वायु के धर्म से तथा अपने धर्म से स्पन्द, स्पर्श और संवित्‌-इन तीन रूपों की निर्मल कल्पनास्वरूप बनकर शीघ्र संकल्प करने से कला और चेतन से चित्‌ कही गयी है । जीवनधारण करने से वह जीवस्वरूपता को प्राप्त है तथा मनन करने से मनरूप से वह स्थित हे । संकल्प करने से संकल्प ओर बोध करने से बुद्धि कही गयी हे । यह अहंकार करने के कारण अहंकारस्वरूपता को प्राप्त हो चुकी है । पुर्यष्टकनामधारिणी यह कुण्डलिनी देह में सर्वोत्तम जीवशक्तिरूप से स्थित हे