Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 53
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग वासनाओं तथा अहंकार से आत्मा की अस्पष्टता तथा शरीर और मन का वैर इत्यादि का वर्णन |
72 verse-groups
- Verse 1उद्दालक ने कहा : परिच्छिन्न तिल आदि फूल आदि से वासित होते हैं आत्मचित् तो आर- पाररहित (अ…
- Verse 2यदि कोई प्रश्न करे कि चैत्यन्यरूप तुम्हारे द्वारा अप्रकाशित विषय में वासना का उदय नहीं दि…
- Verse 3जाग्रत् अवस्था में बुद्धि और अहंकार से बहुत बार किये गये विषय विचारों से और मन से अनुभूत…
- Verse 4एवं स्थूल शरीर से किये गये पाप-पुण्यरूप कर्म से भी उसका सम्बन्ध नहीं होता, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 5अतएव जन्म-मरण भी मेरे नहीं हैं, ऐसा कहते हैं। चित् के जन्म-मरण नहीं हैं, क्योंकि वह सर्व…
- Verse 6अविनाशी अद्वितीयात्मा का दर्शन होने पर वध्य-घातक बुद्धि ही नहीं रह जाती है, अतएव अत्यन्ति…
- Verse 7मरण और जीवन केवलमात्र मन की कल्पनाएँ हैं, इस कारण भी मरण और जीवन में द्वेष ओर वांछा की प्…
- Verse 8जो देह में अहंभावता को प्राप्त है, वह देह के भाव और अभावरूप जन्म मरणों के फन्दे में पड़ता…
- Verse 9देह में अहंभावना क्या अहंकार की है अथवा मन की है या पदार्थ समूह की है ? इनमें से पहले के…
- Verse 10उक्त अर्थ को ही प्रकारान्तर से विस्तारपूर्वक कहते हैं। देह रक्तमांसमय है, मन विचार से नष्…
- Verse 11सब इन्द्र्यो नित्य स्वस्वविषय व्यापाररूप केवल स्वोदरपूरण में ही लगी हैं अहंकारपुष्टिरूप प…
- Verse 12सत्व आदि गुण गुणों के प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहरूप अपने व्यापार में स्थित हैं, प्रकृति (प्…
- Verses 13–14इस देह में जो चिदात्मा है, वह भी सर्वगामी (सर्वव्यापक), सब देहों में स्थित, सर्वकालमय महा…
- Verse 15ऐसी अवस्था में “अहम् रूप से जो केवल इस देह का अभिमानी है, उसकी कैसी आकृति है, (क्या जाति…
- Verse 16अहंकार का सर्वथा अभाव होने पर किसका किससे कौन सम्बन्ध ? सम्बन्ध का अभाव सिद्ध होने पर 'त्…
- Verse 17इस प्रकार सद्वस्तु से व्यतिरिक्त इदं पदार्थ का अन्वेषण करने पर भी उसका मिथ्यात्व ही अन्त…
- Verse 18सत्-अबद्वैत की सिद्धि के बल से भी अहंकार का निरास किया जा सकता है इस आशय से कहते हैं । स…
- Verse 19पदार्थ शोभा बिलकुल है ही नहीं, एकमात्र सर्वव्यापक आत्मा ही है अथवा पदार्थ शोभा भले ही हो…
- Verse 20सम्बन्ध का उपपादन करते हैं। मन अपने अवयवरूप से कल्पित सब इन्द्रियों से मन में ही स्वप्न क…
- Verse 21सम्बन्धाभाव में दृष्टान्त देते हैं। जैसे एक स्थान पर देखे गये भी पत्थर और लोहे की शलाकाओं…
- Verse 22यदि कोई कहे कि तब लौकिक पुरुषों का “यह मेरा धन है“ ऐसा व्यवहार कैसे होता है ? तो इस पर कह…
- Verse 23यह अहंकार चमत्कार आत्मतत्त्व के अज्ञान से उत्पन्न हुआ है तत्त्वज्ञान होने पर तो जैसे सूर्…
- Verse 24आत्मा से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार का मेरा अनुभव सिद्ध जो सत्त्…
- Verse 25अब अहंकार के मार्जन के उपायों को कहते हैं। मैं आकाश की नीलिमा के समान उत्पन्न हुए इस अहंक…
- Verse 26चिरकाल से आरूढ हुए अहंकार भ्रम का समूल परित्याग कर शान्तात्मा हुआ मे जैसे शरत् काल का आक…
- Verse 27अहंकार भ्रम के रहने पर क्या हानि है ? ऐसा यदि कोई कहे, तो इस पर कहते हैं। देहआदि में वृद्…
- Verse 28दुर्वासनारूपी जल से भरे हुए हृदयरूपी आकाश में अहंकाररूपी मेघ के विकास को प्राप्त होने पर…
- Verse 29मरणादि पारलौकिक दुःख पुनर्जन्म तक रहता है एवं जीवन आदि ऐहिक दुःख मरण पर्यन्त रहता है और भ…
- Verse 30जैसे ग्रीष्म ऋतु में सूर्यकान्त मणियों की अग्नि शान्त नहीं होती है वैसे ही दुर्बुद्धियों…
- Verse 31जैसे जल की आश्रयभूत (जल से भरी हुई) मेघमाला गुरुतर पर्वत पंक्ति की ओर दौड़ती है वैसे ही "…
- Verses 32–33अहंकार के क्षीण होने पर सूखा हुआ संसाररूपी वृक्ष रागरूपी अंकुर की उत्पादनशक्ति से रहित अत…
- Verse 34अपनी तृष्णारूपी काली नागिनें, जिन्होंने देहरूपी वृक्ष में अपना बिल बनाया है, विचाररूपी गर…
- Verse 35भाव यह कि विश्व के असत्य सिद्ध होने पर उससे होने वाला सारा का सारा भेदव्यवहार भी असत्य है…
- Verse 36इस रीति से उत्पत्ति से पहले देह आदि की जैसे स्थिति थी वैसी ही सर्वदा रहती है, यह सिद्ध हु…
- Verse 37उक्त अर्थ में दृष्टान्त कहते हैं। जैसे जल, जो कि पूर्वं और उत्तर कालमें तरंग आदि से अविकृ…
- Verse 38इस देह में जो केवल एक क्षण के लिए चेष्टा युक्त है, और भगोन्मुख (जिसका भंग तुरन्त होना ही…
- Verse 39देश से परिच्छिन्न होने के कारण भी देह आदि वस्तुओ में आस्था उचित नहीं है, ऐसा कहते है । उत…
- Verse 40उक्त न्याय को लिगदेह में भी दिखलाते हैं, वह भी सत् से व्यतिरिक्त नहीं है, ऐसा कहते है ।…
- Verses 41–43यदि कोई पूछे कि स्थूल. सूक्ष्म देह आदि यदि असत् ही हैं, तो उनका भान कैसे होता है, इस पर…
- Verse 44हे चित्त, जैसे पुत्र, आदि के न मरने पर भी वंचक पुरुष के कथन से उत्पन्न हुई उनके मरण की बु…
- Verse 45अथवा यह तुम्हारा अपराध नहीं है, किन्तु तुममें अहंभाव के अभ्यासवाले मेरा ही यह अपराध हे ।…
- Verse 46अतएव तुम्हारे विवेकज्ञान से ही मेरे अपराध रूप तुम्हारी शान्ति होती है, ऐसा कहते है । जो क…
- Verse 47तुम्हारे कारण हुई भोगवासनाओं का भी उसी से क्षय हो जाता है, ऐसा कहते है । यह अवास्तविक है,…
- Verse 48अथवा चित् के प्रतिबिम्ब के ग्रहण से चिद्रूप होने के कारण रागरहित हुआ (विरक्त हुआ) अतएव स…
- Verse 49चित्त अपने-आप बाहर प्रवृत्त हुए अपने अवयवरूप इन्द्रिय आदि का संवरण कर तत्वबोध द्वारा पराम…
- Verse 50जैसे वीर पुरुष युद्धभूमि में स्थित अपने शरीर को स्वर्गगामी अपने से भिन्न देखकर और उस शरीर…
- Verse 51मन शरीर का शत्रु (संतापक) है ओर शरीर मन का रिपु (संतापक) हे । जैसे आधार ओर आधेयरूप जल और…
- Verse 52जैसे परस्पर एक-दूसरे के पोषक होने के कारण अनुरागवाले, परस्पर संतापक होने के कारण द्वेषवाल…
- Verse 53यदि कोई शंका करे कि मरण से भोगायतन देह का नाश होने के कारण ही सब दुःखो का परिहार क्यो न ह…
- Verse 54यदि कोई प्रश्न करे कि मन और देह के रहने पर जीव की क्या क्षति है ? तो उस पर कहते हैं। स्वा…
- Verse 55परस्पर विरुद्ध देह और मन जहाँ पर संघटित होते है उस वैषयिक सुखभोग में जो मूर्ख अनुराग रखता…
- Verse 56*रागब्रेषवतो: ऐसा जो पहले कहा है, उसमें मन के देह में राग-द्वेष के अर्थो को दिखलाते है ।…
- Verse 57मन में देह के द्वेषांश को उसके निमित्त के साथ दिखलाते हैं। तदनन्तर उन दुःखों से तापित शरी…
- Verse 58उसकी शत्रुता का लोकप्रसिद्ध न्याय से उपपादन करते हैं। प्रकृति से ही कोई किसी का शत्रु नही…
- Verse 59विविध दुःखों का अनुभव कर रहा शरीर अपने मन का विनाश करने की इच्छा करता है एवं मन क्षण भर म…
- Verse 60इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को दुःख देनेवाले तथा स्वभाव से ही अत्यन्त विरुद्ध इन मन और शरीर…
- Verse 61मन का विनाश होने पर तो देह को फिर दुःख प्राप्ति नहीं होती है, ऐसा कहते हैं। मन का ही विना…
- Verse 62यदि कोई कहे, तब मन भी देह के विनाश के लिए क्यों यत्न नहीं करता है ? तो, इस पर कहते हैं ।…
- Verse 63जैसे शरीर से जलरूप मेघ और तालाब परस्पर एक दूसरे से पुष्टि को प्राप्त होते हैं, वैसे ही शर…
- Verse 64यदि कोई पूछे कि परस्पर विरुद्ध इन दोनों की एकत्र स्थिति किसलिए है ? तो अन्नपाक के लिए परस…
- Verse 65देह को जो चित्त के अधीन कहा, उसका फल कहते हैं। विनाशी चित्त के क्षीण होने पर देह उन्मूलित…
- Verse 66मन के क्षीण होने पर शरीर क्षीण वासनावाला होकर क्षीण हो जाता हे । देह के क्षीण होने पर मन…
- Verse 67संकल्परूपी वृक्षों से भरे तृष्णारूपी लतावाले मनरूपी वन को छिन्न-भिन्न कर विस्तृत मुक्तिरू…
- Verse 68संकल्प का नाश होने पर क्षीण हो रहा अतएव मन में (मनःस्वभाव मेँ) स्थित न हुआ यह मन वासनाजाल…
- Verse 69त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, हड़ी, मज्जा ओर शुक्र नाम की धातुओं का संघातरूप यह देहनामक मेरा श…
- Verses 70–71देह के न रहने पर दुःख क्यो नहीं रहेगा, ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो देह सम्बन्ध के हेतुभूत…
- Verses 72–73को सुनिये । यदि देह मैं (आत्मा) होऊँ, तो सब अंगों के रहने पर भी शव (मुर्दा) क्यों व्यवहार…
- Verse 74न तो मेँ अज्ञानी हूँ, न मुझे दुःख है, न अनर्थ है ओर न मुझमें दुःखिता है। मेरा शरीर रहे चा…
- Verse 75मैं उस परमपद को प्राप्त हो चुका हूँ। मैं सजातीय विजातीय और स्वगत भेद रहित हूँ, मैं सबसे उ…
- Verses 76–77जैसे तिलों से पृथक् किये गये तेल का पेरे हुए तिलों से कोई संबन्ध नहीं रहता वैसे ही मन, द…
- Verses 78–81पूर्वोक्त प्रारब्ध शेष भोगलीला में स्वच्छता आदि गुण सम्पत्तियाँ मेरी हृदयंगम कान्तार हैं,…
- Verse 82सबमें सब कुछ सदा सर्वथा कल्पना से संभव है, अतः सब विषयों के प्रति मेरे रागद्वेष ओर उनके फ…