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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

तेनाहं नाम नेहास्ति भावाभावोपपत्तिमान् । अनहंकाररूपस्य संबन्धः केन मे कथम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी अवस्था में “अहम्‌ रूप से जो केवल इस देह का अभिमानी है, उसकी कैसी आकृति है, (क्या जाति है, अथवा कैसी अंगों की बनावट है ) वास्तव में कौन है, किस रूप से निर्दश के योग्य है, किस हेतु से बनाया गया है, कैसी उसकी रूपरेखा है और किसका विकार है ? अहंभाव से मैं किसका ग्रहण करता हूँ अथवा अहंभाव के अभाव से मैं किसका त्याग करता हूँ १४॥ अतः निर्वचन के अयोग्य होने से अहंकार मिथ्या ही है, इसलिए आत्मा से उसका सम्बन्ध नहीं है, ऐसा कहते हैं। इसलिए अपने अस्तित्व और अभाव में उपपत्ति रखनेवाला "अहम्‌“ नाम का कोई पदार्थ यहाँ पर नहीं है। अतः निरहंकारस्वरूप मेरा किसके साथ ओर कैसे सम्बन्ध हो सकता है