Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 82
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 82 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 82
संस्कृत श्लोक
विगतमोहतया विमनस्तया गतविकल्पनचित्ततया स्फुटम् ।
उपरमाम्यहमात्मनि शीतले घनलवः शरदीव नभस्तले ॥ ८२ ॥
हिन्दी अर्थ
सबमें सब कुछ सदा सर्वथा कल्पना से संभव है, अतः सब विषयों के प्रति मेरे रागद्वेष ओर उनके फल
सुख-दुःख क्षीण हो गये हैं ॥८ १॥ इसलिए मेँ शरत् -ऋतु में आकाश में मेघखण्ड के समान शीतल
(त्रिविधताप शून्य) आत्मा में दृश्यभाव का त्याग करके विश्राम लेता हूँ, क्योकि मेरा मोह मिट चुका है,
मेरा मन क्षीण हो गया है, अतएव चित्त के संकल्प विकल्प भी मुझमें नहीं रह गये हैं