Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
नास्ति शत्रुः प्रकृत्यैव न च मित्रं कदाचन ।
सुखदं मित्रमित्युक्तं दुःखदाः शत्रवः स्मृताः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी शत्रुता का लोकप्रसिद्ध न्याय से उपपादन करते हैं।
प्रकृति से ही कोई किसी का शत्रु नहीं है और प्रकृति से ही कोई किसी का कभी मित्र भी नहीं है। जो
सुख देता है वह मित्र कहा गया है और दुःखदायी शत्रु कहे गये हैं