Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
देहो दुःखान्यनुभवन्स्वमनो हन्तुमिच्छति ।
देहं मनः स्वदुःखानां संकेतं कुरुते क्षणात् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
विविध दुःखों का अनुभव कर
रहा शरीर अपने मन का विनाश करने की इच्छा करता है एवं मन क्षण भर में शरीर को अपने दुःखो का
(०७) “व्योम्न्ययःस्त्रियौँ' इस पाठ में लोहे की स्त्री प्रतिमा ने आकाश में भूमि निगल डाली, इस
कथा के समान है, यह अर्थ है । लोहे की प्रतिमा का आकाश मे जाना और वहाँ पर भूमि को निगलना
जैसे अत्यन्त असंभावित है वैसे ही मन के रहते मरण भी अत्यन्त असंभावित है, यह आशय है ।
स्थान (भोगायतन) बना लेता है