Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
मनः शत्रुः शरीरस्य शरीरं मनसो रिपुः ।
एकाभावेन नश्येते आधाराधेयकार्यवत् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
मन शरीर का शत्रु (संतापक) है ओर शरीर मन का रिपु
(संतापक) हे । जैसे आधार ओर आधेयरूप जल और घड़े का कार्यभूत संयोग दोनों मे से एक के नष्ट
होने पर नष्ट हो जाता है वैसे ही इन दोनों में से एक की वासना के विनाश से ये दोनों नष्ट हो जाते
हैं