Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verses 70–71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verses 70–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
यदर्थं किल भोगश्रीर्वाञ्छते स्वकलेवरम् ।
तन्मे नापि न तस्याहं कोऽर्थः सुखलवेन मे ॥ ७० ॥
नाहं देह इति त्वस्मिन्युक्तिमाकर्णय क्रमे ।
सर्वाङ्गेष्वपि सत्स्वेव शवः कस्मान्न वल्गति ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
देह के न रहने पर दुःख क्यो नहीं रहेगा, ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो देह सम्बन्ध के हेतुभूत मन
के नाश से देह का संबन्ध नहीं है, दुःखप्राप्ति तो दूर गई, इस आशय से कहते हैं।
जिसके लिए भोगेच्छु अपनी देह की इच्छा करता है वह मेरा सम्बन्धी नहीं है ओर न मैं ही उसका
सम्बन्धी हूँ। मेरे सुखलेश से क्या प्रयोजन हे ?