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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

चित्त्वाद्दृष्टात्मना नूनं संत्यक्तमननौजसा । मनसा वीतरागेण स्वयं स्वस्थेन भूयते ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा चित्‌ के प्रतिबिम्ब के ग्रहण से चिद्रूप होने के कारण रागरहित हुआ (विरक्त हुआ) अतएव संकल्प ओर विकल्परूप व्यसन का त्याग कर चुका तथा चरम साक्षात्कारवृत्ति से आत्मसाक्षात्कार कर चुका, मन ही स्वयंस्वस्थ (मोक्षविश्रान्तिमान्‌) होता है, मैं नहीं, क्योकि मैं तो सदा एकरूप हूँ, सदा अद्वितीय ब्रह्म रूप हूँ, फिर मेरी मोक्षविश्रान्ति प्राप्ति कैसी ?