Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verses 72–73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verses 72–73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
तस्माद्देहादतीतोऽहं नित्योऽनस्तमितद्युतिः ।
यः सङ्गं भास्वता प्राप्य वेद्मि व्योमनि भास्करम् ॥ ७२ ॥
नाज्ञोऽहं नच मे दुःखं नानर्थो न च दुःखिता ।
शरीरमस्तु मावास्तु स्थितोस्मि विगतज्वरः ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
को सुनिये । यदि देह मैं (आत्मा) होऊँ, तो सब अंगों के रहने पर भी शव (मुर्दा) क्यों व्यवहार नहीं
करता ? इससे सिद्ध हुआ कि देह आत्मा नहीं है ॥७ १॥ शव में बोध आदि के अदर्शन से यह सिद्ध हुआ
कि मैं देह से अतिरिक्त हूँ, नित्य हूँ, मेरी ज्योति कभी अस्त नहीं होती । जो व्यापक होने के कारण
सूर्यमण्डल में भी स्थित होने से सूर्य से संगत होकर आकाश में सूर्य को जानता हूँ, वही चिद्रप मैं
हूँ