Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
मिथो दुःखाय संपन्ने एकरूपे द्विधा स्थिते ।
व्यवहारपरे सार्धं लोके वार्यनलाविव ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई पूछे कि परस्पर विरुद्ध इन दोनों की एकत्र स्थिति किसलिए है ? तो अन्नपाक के लिए
परस्पर विरुद्ध जल और अग्नि की एकत्र स्थिति के समान पुरुष के भोग और मोक्ष के उपायों के
व्यवहार के लिए ही इनकी एकत्र स्थिति है, ऐसा कहते हैं।
विरुद्ध होने के कारण दो प्रकार से स्थित भी ये अन्योन्यतादात्म्याध्यास से एकरूप होकर दुःखों
का भोग करने के लिए एक साथ भोग और मोक्ष के व्यवहार साधन में तत्पर हुए हैं, जैसे कि लोक
में परस्पर विरुद्ध होने के कारण पृथक्-पृथक् स्थित भी जल और अग्नि अन्नपाक के लिए एकरूप
होते हैं