Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
चित्तं पूर्वं पुरस्ताच्च चिद्देशं शान्तमित्यपि ।
सदसद्वा खलीनं मध्येऽस्मिन्किं तवोदितम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त न्याय को लिगदेह में भी दिखलाते हैं, वह भी सत् से व्यतिरिक्त नहीं है, ऐसा कहते है ।
चित्त (चित्तउपलक्षित लिंग शरीर) अपनी उत्पत्ति से पूर्व समय में और पूर्व प्रदेश में स्वसाक्षी
चिन्मात्र स्वभाव ही था। उत्तरकाल ओर अन्य प्रदेश में नष्ट हुआ देश से परिच्छिन्न भी आकाश में लीन
हुए की भाँति अत्यन्त तिरोहित हुआ वह सत् है या असत् है यह नहीं कहा जा सकता हे । इस प्रकार का
तुम्हारा चित्त (लिंगदेह) वर्तमान समय में और इस प्रदेश में सत् से व्यतिरिक्त क्या उदित हुआ यानी
कुछ भी नहीं