Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
मयैवेहासदभ्यासान्मिथ्या सदिव लक्ष्यसे ।
मृगतृष्णेव तेनैतत्त्वत्कृतं मत्कृतं भवेत् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा यह तुम्हारा अपराध नहीं है, किन्तु तुममें अहंभाव के अभ्यासवाले मेरा ही यह अपराध हे । यहाँ
पर असद्रूप तुममें अहंभाव के अभ्यास से में मृगतृष्णा के तुल्य मिथ्या तुमको सत्-सा देखता हू । इसीसे
तुम्हारे द्वारा किया हुआ यह सब मेरा किया हुआ हो गया है