Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 18
62 verse-groups
- Verse 1चित्तशुद्धि की चरम सीमा दर्शाते हुए उसकी प्राप्ति से ही तत्त्वज्ञता और दृढ़ परमप्राप्ति प…
- Verse 2यह कैसे जाना जाता है ? ऐसी शंका पर कहते हैं। चूँकि सकल जीव संघात की सुषुप्ति के अनन्तर अव…
- Verse 3पदार्थो के प्रकाशवाले हैं किसी अन्य ज्योति से नहीं । भले ही ऐसा हो, तथापि अन्य को अन्यके…
- Verse 4विचित्र सृष्टिरूपी विविध जलाशय पूर्वोक्त चिन्मात्ररूपी एक मार्ग से परस्पर एक दूसरे से मिल…
- Verse 5कोई सृष्टिरूपी जलाशय दूसरी सृष्टि में मिले बिना ही पृथक् स्थिति को प्राप्त है और अन्य सृ…
- Verses 6–7जिसमें प्रत्येक अणु मेँ असंख्य हजारों ब्रह्माण्डरूपी गुंजाफल एक दूसरे से मिले बिना स्थित…
- Verse 8इसीलिए चित्तों का भेद और चित्तोपाधिक जीवों का भेद सिद्ध होता है, इस आशय से कहते हैं। एक म…
- Verse 9इस प्रकार तुल्य कर्म, वासना आदि वाली विभिन्न मनोराज्यरूप सृष्टियों का एक साथ फलोन्मुखता द…
- Verse 10स्थूलदेहता के बद्धमूल होने पर जीव की स्वाभाविक आत्मस्थिति विस्मृत हो जाती है और काल्पनिक…
- Verse 11इस प्रकार कहीं पर अशुद्धों के भी परस्पर सम्बन्धकी उपपत्ति बतलाकर शुद्धों के अन्य के मनोरा…
- Verse 12यदि मनोराज्यों के परस्पर संमिलन से ही स्थूल देह की सत्ता बद्धमूल हुई है, तो संमिलन न होने…
- Verse 13इस प्रकार जाग्रदादि तीन अवस्थारूप इस आत्मा में देहता जल मेँ लहर की तरह स्फुरित नहीं होती…
- Verse 14इसी प्रकार तत्त्ववेत्ता पुरुष सुषुप्ति अवस्था के अवसानभूत तुरीय पद में, जो कि अपना स्वरूप…
- Verse 15तो क्या ज्ञानी ओर अज्ञानी की सुषुप्ति भी भिन्न है ? इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं । ज्ञानी ओर…
- Verse 16सृष्टियों में और भी अवान्तर भेद कहते है । चित् के सर्वव्यापक होने के कारण कोई पुरुष दूसर…
- Verse 17उनमें जेसे कदली के खम्भों में एक के बाद एक पर्त रहते हैँ, वैसे ही भीतर स्थित बहुत से सर्ग…
- Verse 18जैसे सैकड़ों पत्तों के होने पर भी केले में भेद नहीं हे, वैसे ही सैकड़ों सृष्टियों के रहते…
- Verse 19इस प्रकार जगद्भाव को प्राप्त हुए ब्रह्म की पुनः स्वभाव की प्राप्ति में दृष्टान्त कहते है।…
- Verse 20जल के सम्पर्क से उक्त बीज की भी जैसे पुनः वृक्षभावापत्ति होती है, वैसे ही मुक्त की भी पुन…
- Verse 21ऐसा होने पर ब्रह्म का कारण क्या है, इस प्रकार की शंका का भी अवसर नहीं आता, ऐसा कहते हैं ।…
- Verse 22यदि कहिये जैसे पत्ते, शाखा, फूल, फल आदि में सरसता दिखाई देने के कारण उनका स्वभावभूत रस उन…
- Verse 23तब तो चेतन ब्रह्ममात्र कारण से जगत में जाज्यादिस्वभावत्व की असिद्धि हो जायेगी, अतः ब्रह्म…
- Verse 24ब्रह्म निर्विकल्प, अद्वितीय और असंग होने से कारण नहीं है ओर आदि कारण है, ऐसा जो कहा, उसके…
- Verse 25बीज की अपेक्षा ब्रह्म में और भी भेद दर्शाते हुए निर्विशेष ब्रह्म की बीज से जो समता दिखाई…
- Verse 26तब गौणी वृत्ति से उपमा देने का क्या फल है ? इस पर कहते है। ब्रह्म ही अनात्मा के तुल्य उत्…
- Verse 27यदि अपने को ही जगत के तुल्य देखता है, तो उसे अनर्थ की प्राप्ति कैसे हुई, जिससे कि उस अनर्…
- Verse 28यद्यपि उसकी पूणनिन्द स्वप्रकाशता स्वाभाविक है, तथा विभ्रान्ति पैदा होने पर वह व्यर्थ हो ग…
- Verse 29निर्मल, स्वप्रकाश, सर्वगत होने से आत्मा यद्यपि सदा सबके स्पष्टरूप से दर्शन योग्य है, तथाप…
- Verse 30यदि कोई शंका करे बहिर्मुख पुरुष भीतर अपने आत्मा को भले ही न देखे, पर बाहर के और लोगो के आ…
- Verse 31आकाश के तुल्य निर्मल ब्रह्म यत्न से भी प्राप्त नहीं होता । दृश्य को दृश्य रूप से देखने पर…
- Verse 32यदि कोई शंका करे, द्रष्टा को अन्तरात्मा विषयाभिमुख द्रष्टा द्वारा भले ही न देखा जाय, किन्…
- Verses 33–34इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, दृश्य ही दिखाई देता है, द्रष्टा दिखाई नहीं देता । शंका : यदि द्…
- Verses 35–38द्रष्ट्रला भी वास्तविक नहीं है, ऐसा कहते हैं। यदि सर्वस्वरूप द्रष्टा दृश्य में स्थित है त…
- Verse 39अपने में अपने-आप स्फुरित हो रहे दृश्यरूप सैकड़ों शाखाओं से युक्त चिद्रसउल्लास वृक्षों का…
- Verse 40उन-उन ब्रह्माण्डों में भोग चमत्कार भी अनन्त हैं, ऐसा कहते हैं। यह ब्रह्माण्डरूप वन खण्ड ज…
- Verse 41चमत्कृति की विचित्रता में चमत्कृति की कल्पना करनेवाले तत्-तत् जीवों के विचित्र संस्कार…
- Verse 42समान वासनाओं का आविर्भाव होने पर अज्ञानी जीवों की भी सृष्टियाँ परस्पर मिलती हैं, ऐसा जीवस…
- Verses 43–44तब मेरे दूसरों की हजारों संसृतियों को देखने के लिए क्या उपाय है ? ऐसी शंका होने पर कहते ह…
- Verse 45जब चित्त सिद्धि को प्राप्त होता है, तब जीव चित् हो जाता है, वह चित् शुद्ध ओर सर्वगत है,…
- Verse 46मिलन भी स्वकीय परकीय स्वप्नो के दैवात् कहीं संवाद के तुल्य अपने-अपने अन्तःकरण का कल्पनाम…
- Verse 47कई भूतपरम्पराएँ एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में जाती हैँ । स्वप्न परम्परा में भ्रमण करने से…
- Verse 48चिति जहाँ पर जिसकी भावना करती हैं, वहाँ पर वह शीघ्र ही उत्पन्न होता है । उसने स्वप्न में…
- Verse 49जैसे बीज के अन्दर सूक्ष्मरूप से पत्ते, लता, फूल, फलरूप अणु रहते हैं वेसे ही चिद् अणु के…
- Verse 50परमाणुरूप जगत् के अन्दर चित् परमाणु विद्यमान है, ऐसी अवस्था में चित् ओर जगत के सम्पूर्…
- Verse 51पूर्वोक्त का ही स्पष्टीकरण करते है। चेतन देश, काल, और क्रियारूप अपने ही सूक्ष्म अंशो से आ…
- Verse 52ब्रह्मा से लेकर कीडे-मकोडे तक सर्वसाधारण तत्-तत् अन्तःकरणरूप की उपाधि के कारण परिच्छिन्…
- Verse 53जिसका सबको अनुभव होता है वह क्या है ? ऐसी यदि किसी को जिज्ञासा हो, तो उस पर कहते हैं । यह…
- Verse 54चिद्रूपी परमाणु खूब विकसित शरीर होकर नेत्र आदिरूप पुष्प द्वारों से संविद्रूपी सुगन्धि को…
- Verse 55कोई व्यष्टिरूप चिद्घट (घडे के सदुश स्थूलदेह के परिचछेद से चेतन ही मानों घट ठहरा यानी जीव)…
- Verse 56कोई समष्टिरूप (विराट्) जगत को साफ-साफ अपने अन्दर ही देखता है । वहाँ पर चिरकाल के अभ्यास…
- Verse 57जगत में एक स्वप्नरूप जगत से दूसरे स्वप्नरूप जगत को एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न के समान पुनः…
- Verse 58स्फुरित हो रहे कोई शरीर परस्पर सम्मिलित हैं, कोई भ्रमशून्य आत्मा में स्थित हैं, कोई आत्मज…
- Verse 59जो अपने अन्दर दृश्य को देखनेवाले हैं, उनका द्वैतमिथ्यात्वज्ञान विशेष है, ऐसा कहते हैं। जो…
- Verse 60उन लोगों की दृष्टि में भीतर ही विश्व का उदय होने पर भीतर ही विश्व की सत्ता का हेतु है। कि…
- Verses 61–63जीव के अन्दर दूसरे जीव का, दूसरे जीव के अन्दर फिर दूसरे जीव का, फिर दूसरे जीव का यों अव्य…
- Verse 64बुद्धि के विषयाभिमुखता का त्यागकर अर्न्तमुख होने पर एक ही साथ आन्तर ओर बाह्य दृश्य परिज्ञ…
- Verse 65जिस सद्बुद्धि पुरुष की विचार करने से संसारिक विषयभोगलिप्सा दिन प्रतिदिन घटती जाती है, उसक…
- Verse 66इन्द्रिय विजय में अभ्यास करके यदि वैराग्य हो, तो वही वैराग्य विवेक का कारण होता है, अन्य…
- Verse 67विवेक भी यदि वैराग्य, मुमुक्षा की उत्कण्ठा होने से सन्यास, श्रवण आदि फल में पर्यवसन्न हो,…
- Verse 68तब विवेक के मन में स्थित होने की क्या पहचान है ? इस शंका पर वैराग्य ही एकमात्र उसकी पहचान…
- Verse 69रागी पुरुष द्वारा वाणीमात्र से प्रदर्शित विवेक अविवेक की शाखा-प्रशाखारूप होने से अविवेक ह…
- Verse 70पहले विवेक से राग (विषयेच्छा) घटता है, इसमें सन्देह नहीं है, राग के घटने से वैर समूल नष्ट…