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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verses 43–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 43 ,44

संस्कृत श्लोक

स्वयं विहृत्य संसारे शाम्यन्ति चिरकालतः । सूक्ष्मया परया दृष्ट्या त्वं पश्य ज्ञानचेतसा ॥ ४३ ॥ जगज्वालसहस्राणि परमाण्वन्तरेष्वपि । चित्ते नभसि पाषाणे ज्वालायामनिले जले ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

तब मेरे दूसरों की हजारों संसृतियों को देखने के लिए क्या उपाय है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं । आप पूर्वोक्त शुद्धचित्त लोगों के दर्शनोपाय से परमाणुओं के भीतर में भी हजारों जगत्परम्पराओं को देखिये । जैसे सारे तिल में तेल रहते है, वैसे ही चित्त में, आकाश में, शिलाओं में, ज्वाला में, वायु में तथा जल में लाखों संसार विद्यमान हैं