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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

यथा बीजान्तरे पत्रलतापुष्पफलाणवः । परमाणुजगत्यन्तर्मन्ये चित्परमाणवः । लीनमाकाशमाकाशे द्वैतैक्यभ्रममुत्सृज ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

परमाणुरूप जगत्‌ के अन्दर चित्‌ परमाणु विद्यमान है, ऐसी अवस्था में चित्‌ ओर जगत के सम्पूर्ण रूप से परस्पर अन्दर प्रवेश को आश्चर्य मानता हूँ, यह अर्थ है । अथवा यह आश्चर्य नहीं हे, क्योकि चिदाकाश ही, जो कि जगद्भमों के द्वारा भेद से गृहीत था, अपने में लय हो जाता है, इसी आशय से कहते हैं, आकाश आकाश में लीन हो गये, अतः आप द्वैत या एकत्व के भ्रम का त्याग कीजिये