Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
देहत्वपरिरूढत्वाच्चिद्धेम्ना विस्मृतात्मना ।
मिथ्यानुभूताऽविद्या तु शुद्धा कटकतामिता ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूलदेहता के बद्धमूल होने पर जीव की स्वाभाविक आत्मस्थिति विस्मृत हो जाती है और काल्पनिक
संसार स्थिति को वह स्वीकार कर लेता है, ऐसा कहते हैं।
जैसे अपने स्वरूप की विस्मृतिवाला सोना शुद्ध कटकता को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने स्वरूप
की विस्मृतिवाले चैतन्यरूपी सुवर्ण ने देहत्व के बद्धमूल होने के कारण कटकत्व के सदुश केवल संसाररूप
अविद्या का मिथ्या ही अनुभव किया है