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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

सर्वेषां जीवराशीनामात्मावस्थात्रयं श्रितः । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्यमत्र देहो न कारणम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि मनोराज्यों के परस्पर संमिलन से ही स्थूल देह की सत्ता बद्धमूल हुई है, तो संमिलन न होने पर देह ही नहीं रहेगी, अतः - नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्‌ कण्ठे स्वप्नं समादिशेन । चुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम्‌ ॥ अर्थात्‌ जाग्रदवस्था को नेत्र में स्थित जानें, स्वप्न को कण्ठदेश में स्थित समझें, सुष॒प्त को हृदय में स्थित जानें ओर तुरीय अवस्था को मस्तक में स्थित समझें । इस प्रकार श्रुति द्वारा बोधित देह के विभिन्न प्रदेशों मे अवस्थिति के अधीन जाग्रदादिअवस्था भी नहीं होगी, ऐसी आशंका करके कहते हैं । सम्पूर्ण जीवों का आत्मा जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्तिनामक तीन अवस्थाओं को प्राप्त ह । इनमें देह कारण नहीं है , भाव यह कि जीवत्व के स्वभाव से ही तीन अवस्थाओं की कल्पना है । देह के कारण उनकी कल्पना नहीं है, क्योकि जाग्रत की कल्पना के बिना देह की सिद्धि न होने से अन्योन्याश्रय दोष प्राप्त होगा । श्रुति तो दूसरे की दृष्टि से सिद्ध देह के अनुवाद द्वारा उसके एक देश में दिखाई देने के कारण जाग्रदादि प्रपंच विस्तार सत्य नहीं है, यह तात्पर्य प्रकट करती है, देहजाग्रदादि अवस्थाओं का हेतु है, यह तात्पर्य प्रकट नहीं करती