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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

स्वभावो निर्विशेषत्वात्परो वक्तुं न युज्यते ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कहिये जैसे पत्ते, शाखा, फूल, फल आदि में सरसता दिखाई देने के कारण उनका स्वभावभूत रस उनका कारण है, वैसे ही जगत का कारण ब्रह्म भी जगद्धर्मस्वभाव ही होगा, ऐसी अवस्था में ब्रह्मकारणता स्वभावकारणतावाद ही ठहरी, ऐसी शंका करके कहते है । पर ब्रह्म परमात्मा निर्विशेष होने के कारण स्वभाव नहीं कहा जा सकता । भाव यह है कि कार्य के साथ उत्पन्न होनेवाले असाधारण कर्मविशेषरूप कार्यस्वभाव का कारण में सम्भव नहीं हो सकता