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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

द्वयोरेकस्वरूपैव स्वसौहार्दनिदर्शनात् । अज्ञः सुषुप्तोऽसंबुद्धो जीवः कश्चित्स सर्गभाक् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

तो क्या ज्ञानी ओर अज्ञानी की सुषुप्ति भी भिन्न है ? इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं । ज्ञानी ओर अज्ञानी दोनों की सुषुप्ति समान ही है, क्योकि अज्ञानी की भी सुषुप्ति श्रुति में निरतिशयानन्दरूप मोक्ष के दष्टान्तरूप से कही गई हे । शंका : तब वह सुषुप्ति क्यों एक की सृष्टि की कारण होती है और अन्य की नहीं होती ? उसमें अन्तर क्या आया ? समाधान : इन दोनों में जो सुषुप्ति-अवस्थापन्न अज्ञानी है, वह वास्तव आत्मज्ञान से रहित है ओर देहादि में आत्मतत्त्व भ्रान्ति की वासना से वासित भी है । इसी भेद के कारण अज्ञानी पुनः सृष्टि भाजन होता है