Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
नाकारणे कारणादि परे वस्त्वादिकारणे ।
विचारणीयः सारो हि किमसारविचारणैः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो चेतन ब्रह्ममात्र कारण से जगत में जाज्यादिस्वभावत्व की असिद्धि हो जायेगी, अतः ब्रह्म में
जडता, दुःखादि स्वभाववाले जगत के अन्य कारण का और जगत में वैचित्र्य के हेतु अन्य निमित्तों को
स्वीकार करना पडेगा, यदि ऐसी कोई शंका करे, तो उस पर कहते हैं।
निर्विकार, अद्वितीय, असंग होने के कारण वस्तुतः अकारण सम्पूर्ण प्रपंच के आरोप के आदि
कारण ब्रह्म मेँ कारण, निमित्त आदिवस्तु का भी संभव नहीं है । भाव यह कि ब्रह्मस्वभावसे विरोध होने
के कारण ही अकारणविवर्तरूप जगत मिथ्या ही हे ।
शका : जड़, अनृत, दुःखरूप जगत का जड, असत्य दुःखरूप ही आदि कारण होना उचित है,
उसी का विचार करना चाहिए । जो जगत का कारण नहीं है, उस ब्रह्म के विचार से क्या लाभ ?
समाधान : सार वस्तु का (ब्रह्म का) ही विचार करना उचित है, ब्रह्म के अतिरिक्त असार वस्तु के
विचारों से कौन पुरुषार्थ सिद्ध होगा ?