Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
विचारो यस्य नोदेति कोऽहं किमिदमित्यलम् ।
तस्यान्तर्न विमुक्तोऽसौ दीर्घो जीवज्वरभ्रमः ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धि के
विषयाभिमुखता का त्यागकर अर्न्तमुख होने पर एक ही साथ आन्तर ओर बाह्य दृश्य परिज्ञात होकर विनष्ट
हो जाता है, जैसे कि तत्त्वतः परिज्ञान होने पर कटकत्व आदि सुवर्ण में विनष्ट हो जाते हैं ॥६ ३॥
इस प्रकार तत्त्वस्राक्षात्काररूप चिन्मात्रपरिशेषलक्षण शुद्धिलाम को दर्शाकर उसकी प्राप्ति और
स्थिति के इन्द्रियजन्य आदि से लेकर विचारपर्यन्त उपायों को आगे-पीछे (सिलसिले के बिना) आरम्भ
करते हैं।
जिस पुरुष के मन में “मे कोन हूँ” "यह जगत क्या है", ऐसा दृढ़ विचार नहीं उठता है, उसके अन्दर
यह बड़ा भारी जीवज्वरभ्रम नहीं छूटता