Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तेष्वप्यन्तस्थसर्गौघाः कदलीदलपीठवत् ।
सर्वसर्गान्तरादूरं पत्रपीवरवृत्तिमत् ।
स्वभावशीतलं ब्रह्म कदलीदलमण्डपः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें जेसे कदली के खम्भों में एक के बाद
एक पर्त रहते हैँ, वैसे ही भीतर स्थित बहुत से सर्गो के समूह हैं | विस्तारयुक्त पत्तों से मानों बृहत्,
बाहर और अन्तर के सम्पूर्णं सर्गो के समूह है । उनसे रहित ब्रह्म केले के पत्तों के मण्डप के तुल्य स्वभाव
शीतल है