Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
दृश्यं पश्यन्स्वमात्मानं न द्रष्टा संप्रपश्यति ।
प्रपञ्चाक्रान्तसंवित्तेः कस्योदेति निजा स्थितिः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अपने को ही जगत के तुल्य देखता है, तो उसे अनर्थ की प्राप्ति कैसे हुई, जिससे कि उस
अनर्थ के परिहार के लिए शास्त्र सफल हो, इस शका पर कहते है ।
अपने को दृश्यरूप से देख रहा दृष्टा अपनी यथार्थ आत्मा को नहीं देखता | इसी से उसे अनर्थ की
प्राप्ति हुई है। जिसकी बुद्धि प्रपंच से आक्रान्त हो, ऐसे किस पुरुष को अपनी यथार्थ स्थिति ज्ञात होती
हे २