Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
सन्ति संसारलक्षाणि तिले तैलमिवाखिले ।
सिद्धिमेति यदा चेतस्तदा जीवो भवेच्चितिः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब चित्त सिद्धि को प्राप्त होता है, तब जीव चित्
हो जाता है, वह चित् शुद्ध ओर सर्वगत है, अतएव उसका परस्पर अन्यो से मिलन होता है