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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

जगद्दीर्घमहास्वप्नः सोऽयमन्तः समुत्थितः । स्वप्नात्स्वप्नान्तरं यान्ति काश्चिद्भूतपरम्पराः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

कई भूतपरम्पराएँ एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में जाती हैँ । स्वप्न परम्परा में भ्रमण करने से दीवार आदि के तुल्य ठोस परमात्मरूप वस्तु में इस संसाररूप दीर्घ स्वप्न की प्राप्ति होती हे ओर संसाररूपी स्वप्न की वासना की दृढता से वह दुढतर है