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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

कचितं किंचिदेवेह वस्तुतस्तु न किंचन । स्वयं सत्यं स्वादयन्ते द्वैतं चित्परमाणवः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका सबको अनुभव होता है वह क्या है ? ऐसी यदि किसी को जिज्ञासा हो, तो उस पर कहते हैं । यह जो स्फुरित हुआ है (दृष्टिगोचर हुआ है), यह अनिर्वचनीय ही है। शंका: फिर वह है क्या ? समाधान : चित्‌परमाणु (जीव) साक्षात्‌ सत्य आत्मा को ही द्वैतरूप से आस्वादन करते हैं। भाव यह कि जैसे कोई भ्रान्तपुरुष स्वयं अपने कन्धे पर चढ़ने की इच्छा करता है, वैसे ही चितूपरमाणुरूप जीव भी सत्य आत्मस्वरूप को ही द्वैत मानते हुए भ्रान्तिवश उसका अनुभव करता है