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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

तादृग्भावस्वरूपेण विना यत्र न दृश्यते । तत्रापि दूरोदस्तैव द्रष्टुः सूक्ष्मस्य दृश्यता ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे, द्रष्टा को अन्तरात्मा विषयाभिमुख द्रष्टा द्वारा भले ही न देखा जाय, किन्तु घटादि विषयों का अधिष्ठानभूत आत्मा तो बाह्यवृत्तिव्याप्ति से दिखाई देना चाहिए, क्योकि उसमें प्रत्यंमुखता का कोड उपयोग नहीं है, इस पर कहते हैं। घटादि विषय प्रदेश में वृत्त्यवच्छिन्न द्रष्टा की वृत्ति के बाह्य घटादि के आकार में परिणत हो जाने से जहाँ द्रष्टा की भी घटादिस्वरूप प्राप्ति के बिना घटादि नहीं देखे जा सकते । वहाँ पर द्रष्टा की दृश्यता दूरतः अपास्त ही है, इसी अर्थ को बतलाने के लिए 'सूक्ष्मस्य” यह विशेषण दिया है । भाव यह है कि विषयाकारवृत्ति के साथ तादात्म्यापन्नस्वरूप से अतिरिक्त सूक्ष्म चिन्मात्र का दर्शन नहीं हो सकता है