Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verses 35–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verses 35–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 35-38
संस्कृत श्लोक
तत्तथानुभवत्याशु स एवोदेति तत्तथा ।
यथा मधुरसोल्लासः खण्डो भवति भासुरः ॥ ३५ ॥
रसतामजहच्चैव फलपुष्पलतोन्नतः ।
चिदुल्लासस्तथा जीवो भूयो भवति देहकः ॥ ३६ ॥
चिन्मात्रतां तामजहदेव दर्शनदृक्मयम् ।
अन्तःस्वानुभवश्चैव जगत्स्वप्नं प्रपश्यति ॥ ३७ ॥
अहंतादिरसे भौमे खण्डकत्वमिवात्मनि ।
नानाखण्डसहस्रौघैरद्वितीयैर्निजात्मनः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्ट्रला भी वास्तविक नहीं है, ऐसा कहते हैं।
यदि सर्वस्वरूप द्रष्टा दृश्य में स्थित है तो द्रष्ड्रता कहाँ रही ? भाव यह कि दृश्य प्रदेश में जो स्थित
नहीं है, उसकी द्र॒ष्ड्ता नहीं हो सकती ओर सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता" इत्यादि श्रुति भी है, इससे
द्रष्टा को सर्वात्मा और दृश्य में स्थित अवश्य कहना चाहिये । ऐसा यदि है, तो उसके आत्मभूत सम्पूर्ण
दृष्ट में, अपने में क्रिया का विरोध होने से द्रष्ट्रता कैसे होगी ? यदि कहिये कि सर्वशक्तिमान होने के
कारण राजा की तरह वह दृश्य को उत्पन्न कर उसका वैसा अनुभव करता हुआ द्रष्टा होता है, तो अपने
से अतिरिक्त उपकरण की अपेक्षा होने पर शक्ति संकोच मानना पडेगा; अतः स्वयं अविकृत ही वह
तत्-तत् द्वश्य रूपसे उदित होता है, यहीं पर अवशिष्ट रहता है। इससे सिद्ध हुआ कि द्रष्ड्रतारूप
अतिरिक्त वस्तु की सिद्धि नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
राजा के समान सर्वशक्तिमान द्रष्टा जिस जिस वस्तु को जैसे प्राप्त होता है, वैसे ही शीघ्र उसका
अनुभव करता है। सर्वशक्तिमान द्रष्टा ही दृश्यरूप में उदित होता है ॥ ३ ४॥ जैसे वसन््तरस का उल्लास
अपनी रसता का त्याग न करता हुआ ही फल, पुष्प और लतारूप से उन्नत देदीप्यमान वनखण्ड होता
है, वैसे ही चित का उल्लास भी अपनी चिन्मात्रता का त्याग किये बिना ही जीव और तदनन्तर देह होता
है। स्वानुभवरूप ही वह इक्षुविकार रूप रस में शर्करा की नाई अहन्तादि रसवाले अपने में दर्शन, दृश्य
रूप जगत स्वप्न को देखता हे । जैसे ईख का रस ईख के रस से भिन्न विविध सैकड़ों शर्करा-खण्ड
आदि के रूप से उदित होता है, वैसे ही चेतन भी अपने स्वरूप से अभिन्न विविध जगद्रूप से निश्चय
उदित होता हे