Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
सर्वगत्वाच्चितः कश्चित्परसर्गेण नीयते ।
सर्गे सर्गे पृथग्रूपं सन्ति सर्गान्तराण्यपि ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टियों में और भी अवान्तर भेद कहते है ।
चित् के सर्वव्यापक होने के कारण कोई पुरुष दूसरे सर्ग के भीतर पहुँचाया जाता है । प्रत्येक सर्ग में
ओर भी दूसरे-दूसरे सर्ग अलग-अलग विद्यमान हैं