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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्तिभाजो ये जीवास्ते तन्मात्रप्रदर्शिनः । तन्मात्रैकतया सर्गान्मिथः पश्यन्ति कल्पितान् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

पदार्थो के प्रकाशवाले हैं किसी अन्य ज्योति से नहीं । भले ही ऐसा हो, तथापि अन्य को अन्यके मनोराज्य की प्रदर्शन सिद्धि कैसे हुई ? ऐसा यदि कहिये, तो सुनिये, स्व-स्वसाक्षी चिन्मात्र केउपाधि संयोग से या ब्रह्मैक्यदा्द्य से एकत्व की प्राप्ति होने के कारण जीव परस्पर की सृष्टियोंको देखते हैं, अन्यथा नहीं देख सकते