Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
स्वयं सर्गस्य कचितः स्वप्ने चिदणुखण्डकः ।
ब्रह्मादेः कीटनिष्ठस्य देहदृष्ट्यानुभावितः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मा से लेकर कीडे-मकोडे तक सर्वसाधारण तत्-तत् अन्तःकरणरूप की उपाधि के कारण
परिच्छिन्न हुआ चिदणुखण्ड प्रलयकाल में यद्यपि अस्फुट रहता है तथापि सृष्टि का स्वप्न प्राप्त होने
पर स्फुट होकर तत्-तत् देहदृष्टि से अनुभव को प्राप्त कराया जाता हे