Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 60
उनसठवाँ सर्ग समाप्त साठवाँ सर्ग वसिष्ठजी को समाधि में शब्द करनेवाली स्त्री का अवलोकन तथा उसकी उपेक्षा करने पर फिर अनेक विचित्र जगत् का दर्शन।
61 verse-groups
- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्री रामभद्र, इतने असंख्य संसार देखने के बाद मैंने शब्द के कारण…
- Verse 2जब मेँ उक्त आकाशरूप बन गया, तब मैंने वीणा के शब्द के सदुश शब्द सुना, क्रमशः उसके पद भी स्…
- Verse 3अनन्तर मेरी योगदुष्टि पास में ही, जहाँ से शब्द हो रहा था, उस देश में पड़ गई। मैंने वहाँ ए…
- Verse 4उसके गले की माला और पहिने हुए वस्त्र खूब फरफरा रहे थे, उसके लोचन कानों के केशो को भी व्या…
- Verse 5उसके अंग कमनीय सुवर्णं के सदृश गौरवर्ण के थे, मार्गस्थ पथिक के सदुश उसका नवीन यौवन धीरे-ध…
- Verse 6उसका मुख तो पूर्णचन्द्र के सदृश था, उसका हास्य फूल के ढेर-से लुभावना था, यौवन के कारण उसक…
- Verse 7आकाश का कोश ही उसके रहने का घर था, वह सुन्दर तो इतनी थी कि जितनी शशांक चन्द्रमा की किरणें…
- Verse 8भद्र, उस वामा ने मेरे पास में आकर अत्यन्त मधुर स्वर से मृदु एक आर्या पढ़ी, उस स्त्री का व…
- Verse 9उसी आर्या छन्द को बतलाते हैं हे मुने, खल पुरुषों के लिए ही अपनी योग्यता रखनेवाले काम, क्र…
- Verse 10वह चुनकर आपने कया किया; इस प्रशन पर कहते हैं भद्र, यह सुनकर और उस सुन्दरमुखी एवं मधुरशब्द…
- Verse 11उसके बाद मैंने असंख्य जगत् से युक्त माया देखी, उसे देखकर मुझे अत्यन्त आश्चर्य हुआ, उसका…
- Verses 12–13तदन्तर मायाजनित उस चिन्ता को छोड़कर शून्यस्वभाव आकाश में स्थित जगन्माया को चिदाकाशरूप होक…
- Verse 14भद्र, अतः ये सब शून्यरूप हैं, इसलिए परमार्थ में ये कोई जगत् कहीं किसी समय न तो देखते हैं…
- Verse 15भद्र, जिनमें उन्मत्त पुष्करावर्त नाम के प्रलयकारी मेघ बरसते हैं, उन्मत्त उत्पातकारी वायु…
- Verse 16धधक रही प्रलयाग्नि के विस्फोटों से कुबेर के भवन जिनमें चट-चट शब्द कर रहे हैं, जिनमें आकार…
- Verse 17इधर-उधर लुढ़कते हुए देवनगरों के समूहों के व्यापक क्रन्दनों के कारण घर्घर शब्द कर रहे समस्…
- Verse 18प्रलयमण्डल की भयंकर अग्नि की ज्वालाओं के विलासों से विस्पष्टरूप से पट- पट शब्दकर रहे तथा…
- Verse 19देवता, दानव और मनुष्य के घरों के घर्घर क्रन्दनध्वनियोंसे, जो अतिकर्कश हैं तथा चुलोक तक सा…
- Verse 20भद्र, उन वर्णित जगता में एक दुसरे के भीतर इस तरह के कल्पान्तकाल प्रवृत्त हुए रहते हैं, पर…
- Verse 21इस प्रकार जगत् की प्रासंगिक परस्पर शून्यता का वर्णन कर अब प्रस्तुत विषय कहते हैं / हे श्…
- Verse 22भद्र, उस तरह अनेक प्रकार के जो ब्रह्मांड आपको बतलाये, उनमें जो चितिरूप वस्तु है, उसी में…
- Verse 23अस्तु, कल्पना से ही उदय और अस्त है, इससे प्रक्रत में क्या आया, इस पर कहते हैं / श्रीरामजी…
- Verse 24किस प्रकार के तर्क से किस प्रकार करा उदय है ओर किस तरह का क्षय ढै इसका उदाहरण देते हैं। ह…
- Verse 25यह सारा नामरूपात्मक जो जगत् है, वह नामरूपात्मक कल्पना के द्वारा आकाश ही भासता है, क्योकि…
- Verse 26यों विचार करने पर अपने को जो अनुभव हुआ, उत महाराज वस्तिष्ठजी बतलाते है / हे प्रिय श्रीराम…
- Verse 27अन्तिम साक्षात्कार की जो वृत्ति है, तद्रूप आकाश में आविर्भाव हो जाने के कारण एकरूप, पूर्ण…
- Verse 28यह सम्पूर्णा जग्रत् का बिछा हुआ जाल ब्रह्मरूप निर्मल आकाश ही हैं / जगत् अन्तर्गत दसों द…
- Verse 29श्रीरामजी, वासनानुसार अनेक तरह की भिन्नता को लिये हुए जो संसार मुझे दिखाई दिये, उनमें आका…
- Verse 30हे ब्रह्मन्. वहाँ मैंने बहत्तर त्रेतायुग देखे । वे सभी रामावतार से युक्त थे, सैकड़ों सतय…
- Verse 31भेदवासना की प्रबलता से तत्-तत् सर्गो की अवस्था अनेक तरह की मैने देखीं और तत्त्वदृष्टि स…
- Verse 32इस स्थिति में दृष्टिभेद से ब्रह्म प्रप्रपंच और निष्प्रपंच हो सकता हैं, इस विषय में विरोध…
- Verse 33जो ब्रह्मरूप पाषाण के सदुश सब तरह के वाणी के व्यापारं से रहित हैं, समस्त नाम और रूपों से…
- Verse 34वास्तव में चेत्य तो चिदाकाश में है नहीं, परन्तु चिति की अपनी सत्ता ही जगत् के रूप में भा…
- Verse 35एकमात्र प्रकाशरूप ब्रह्म अपने अनन्य (अभिन्न) सब कुछ उस तरह करता है ओर नहीं भी करता, जिस त…
- Verse 36जग्रत् चिद्रूप ही है, तब चन्द्र शीतल और सूर्य यरम क्यो 2 उलटा भी हो सकता है, यदि यह कहें…
- Verse 37कहीं पर अन्धकार में प्रजाएँ देखती हैं और कहीं प्रकाश में भी नहीं देखती । ठीक उल्लूओं के ज…
- Verse 38कहीं तो प्राणी पुण्य से नष्ट हो जाते हैं और कहीं पापों से स्वर्ग जाते हैं, कहीं पर विषभोज…
- Verse 39ऐसा क्यो; इस पर कहते हैं / भद्र, दीर्घकाल के अभ्यास से दृढ़ किये गये बोध में जो वस्तु जैस…
- Verse 40इस ब्रह्माण्ड में ग्रभिद्ध जो अरण्य है, उसे विपरीत पत्र, पुष्प आदि से सम्पन्न अरण्य अन्य…
- Verse 41इसी तरह हजारों असम्भावित वस्तुओं का अन्यत्र सम्भव है, यह कहते हैं । श्रीरामजी, कहीं पर तो…
- Verses 42–43कहीं लकड़ी, पत्थर और दीवार के ऊपर निर्मित पुतलियाँ देवांगनाओं के साथ गान और वार्ता करती ह…
- Verse 44भद्र, कहीं पर लम्बे-लम्बे प्राणी लम्बे वस्त्रों के सदुश मेघों को बड़े चाव से पहिनते हैं औ…
- Verse 45कहीं पर भूमि आदि लोकों के नीचे के जगत् केवल पशु आदि प्राणियों से ही भरे हैं उनमें मनुष्य…
- Verse 46अतः कोई तो प्राणी कामसंवित्ति से हीन हैं, अतः वो स्त्री के बिना यों ही कहीं पर पैदा हो गय…
- Verse 47कहीं पर तो केवल सर्प ही सर्प हैं, कहीं पर तो सभी रत्न ही रत्न हैं या तो पत्थर ही पत्थर है…
- Verse 48कहीं पर व्यष्टि-अहंभाव नहीं है, केवल समष्टि-अहंभावरूप एकात्मभाव से ही चव शरीरो में भेदव्य…
- Verse 49देहों का भेद होने पर भी एकीशूत आत्मा की भावना किस तरह की है, इस प्रश्न पर कहते हैं / भद्र…
- Verse 50कहीं पर सृष्टि भेद की वासना ही नहीं रहती, इसलिए अव्याक्रत आकाशमात्ररूपता से ही वहाँ भावना…
- Verse 51भद्र, कुछ जगत् निर्विशेष परब्रह्म की दृष्टि हो जाने पर अलीक की तरह ज्ञात होते हैं, कहीं…
- Verse 52कुछ जगत् तो नक्षत्रचक्र से ही रहित है, अतएव कालगति का ही वहाँ पता नहीं लगता। कुछ तो शब्द…
- Verse 53कहीं पर ऐसे प्राणी देखे कि नेत्रशब्द, नेत्ररूप इन्द्रिय और नेत्रजनित रूप आदि का दर्शन ह इ…
- Verse 54भद्र, कुछ तो प्राणी प्राणेन्द्रिय और इससे होनेवाले गन्धज्ञान से रहित हैं, कुछ निरर्थक ही…
- Verse 55कुछ दुसरे वाक्यार्थबोध न होने के कारण मूक हैं, स्पर्शज्ञानशून्य होने के कारण पत्थर के अंग…
- Verse 56कुछ तो मनोराज्य के सदृश विचित्र ही देखे गये, कुछ तो व्यवहार करनेवाले हैं, परन्तु पिशाचों…
- Verse 57कुछ जगत् तो केवल भूमिमय है, उनकी स्थिति एक-सी है, कुछ घनता से रहित हैं, कुछ केवल जल से भ…
- Verse 58कुछ जगत् वायुओं से परिपूर्ण हैं, यानी समस्त कार्यों में समर्थ समस्त वस्तुओं से परिपूर्ण…
- Verse 59हो सकती, उक्त प्रकार होनेवाली शंका का परिहार करते हैं । कुछ जो केवल भूमिपृष्ठपूर्ण अन्य ज…
- Verse 60जो कुछ दूसरे केवल जल से ही परिपूर्ण पृथ्वी, वन, पर्वत आदि हैं, उनमें भी प्राणी, मगर के सद…
- Verses 61–62दुसरे जो जगत् केवल अग्नि से ही पूर्ण है, उनमें जल आदिसे रहित भी प्राणी, अलातचक्र के सदुश…
- Verse 63अन्य जो केवल वायु से पूर्ण जगत् है, उनमें जो भूत हैं वे जल, अग्नि आदि से यद्यपि रहित हैं…
- Verse 64उम्र चिदाकाश में नीचे, ऊपर एवं चारों ओर कल्पित दिशाओं में उड़ रहे वित्र-विचित्र सब जग्रत्…