Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
क्वचित्प्रत्येकमात्मानं पश्यत्याप्नोति नेतरत् ।
बहुभूतकमप्यस्ति जगदित्येकभूतकम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर व्यष्टि-अहंभाव नहीं है, केवल समष्टि-अहंभावरूप एकात्मभाव से ही चव शरीरो में
भेदव्यवहार होता है, यह कहते हैं /
कहीं पर प्रत्येक प्राणी अपनी समष्टि आत्मा को देखता है और दूसरे व्यक्ति को देखता या
पाता ही नहीं । ऐसा होने पर भी वह लोक योनिज आदि चार प्रकार के प्राणियों से युक्त हैं और
एक-एक तरह के प्राणियों से भी युक्त हैं