Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तदाकाशमिदं भाति जगदित्यभिशब्दितम् ।
तेनैव शब्दनभसा सर्वे हि परमं नभः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सारा
नामरूपात्मक जो जगत् है, वह नामरूपात्मक कल्पना के द्वारा आकाश ही भासता है, क्योकि
आकाश ही वायु आदि क्रम से जगत् के आकार में बन जाता है, यह बात श्रुतियों में प्रसिद्ध
है और वही शब्दतन्मात्रारूप होने के कारण सब वस्तुओं के लिए साधारण नामात्मक भी बन
जाता है । अतः “तत्वमसि” आदि शब्दरूप से परिणत आकाश के कारण सब जगत् परम
चिदाकाशरूप ही है, वही इसका आत्यन्तिक क्षय है