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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ततोऽहमभितो भ्रान्तस्तादृशं प्रविचारयन् । बहुकालमसंरुद्धसंविदाकाशतां गतः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्री रामभद्र, इतने असंख्य संसार देखने के बाद मैंने शब्द के कारण को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते चारों ओर बहुत काल तक खूब भ्रमण किया तदनन्तर मैं आवरणरहित संविदाकाशरूप बन गया

सर्ग सन्दर्भ

उनसठवाँ सर्ग समाप्त साठवाँ सर्ग वसिष्ठजी को समाधि में शब्द करनेवाली स्त्री का अवलोकन तथा उसकी उपेक्षा करने पर फिर अनेक विचित्र जगत्‌ का दर्शन।