Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
ततस्तां तत्कृतां चिन्तामलमुत्सृज्य खे स्थिताम् ।
जगन्मायां कलयितुं व्योमात्माहं प्रवृत्तवान् ॥ १२ ॥
प्रमत्तपुष्करावर्तानुन्मत्तोत्पातमारुतान् ।
स्फुटिताद्रीन्दृढाकारघटितब्रह्ममण्डपान् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदन्तर
मायाजनित उस चिन्ता को छोड़कर शून्यस्वभाव आकाश में स्थित जगन्माया को चिदाकाशरूप
होकर जानने के लिए मैने ज्यों ही प्रवृति की, त्यों ही वे सब जगत् उस तरह शून्यरूप हो गये, जिस
तरह स्वप्न, मनोराज्य और कथा के अर्थ के प्रकाशन में जगत् शून्यरूप हो जाते हैं