Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
विभात्यचेत्यं चिद्व्योम्नि स्वसत्तैव जगत्तया ।
निराकारे निराकारा स्वप्नानुभवसंनिभा ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तव में चेत्य तो
चिदाकाश में है नहीं, परन्तु चिति की अपनी सत्ता ही जगत् के रूप में भासती है । वह स्वप्न के
अनुभव के सदुश भ्रान्तिरूप है, अतः निराकार ब्रह्म में भास रही सृष्टि वास्तव में निराकार रूप ही
है