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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

नखकेशादिके यद्वत्तद्वदन्यत्र संस्थितः । आत्मवत्सर्वभूतानामेकीभूतात्मभावना ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

देहों का भेद होने पर भी एकीशूत आत्मा की भावना किस तरह की है, इस प्रश्न पर कहते हैं / भद्र, कोई पुरुष अपने नख, केशादि के उतारने और उत्पन्न होनेपर अपना निजी छेदन और जन्म देखता है, इसलिए वह अपनी अन्यत्र स्थिति मानता है । परन्तु उसके सौँन्दर्यादि सुख भोग में उसकी एकीभूत आत्मभावना ही देखी जाती है